2 साल के बेटे को थी लाइलाज बीमारी, पिता ने घर में लैब बनाकर तैयार की दवा


Father Units Up House Laboratory to save lots of his Son : कहते हैं कि पिता बरगद (Banyan) के समान होता है, वो किसी भी परिस्थिति में अपने बच्चों को नहीं छोड़ता. हमेशा उनपर अपना साया बनाए रखता है. हर पिता की कोशिश यही रहती है कि उसके बच्चों को कभी कोई परेशानी ना आए. ऐसे ही एक पिता के संघर्ष को बताती न्यूज रिपोर्ट दैनिक भास्कर अखबार ने छापी है. इस रिपोर्ट के अनुसार, चीन के शु वेई (Xu Wei) अपने दो साल के बटे हाओयांग (Haoyang) की जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं. हाओयांग (Haoyang) की लाइफ बस कुछ महीनों की ही बची है, लेकिन उसके पिता उसे बचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते. हाओयांग को दुर्लभ मेनकेस सिंड्रोम (Menkes syndrome) है. बेटे के लिए शु वेई (Xu Wei) ने अपने फ्लैट में ही मेडिसिन लैब बना दी है. जहां वो बेटे के इलाज में काम आने वाली दवा बना रहे हैं.

मेनकेस सिंड्रोम (Menkes syndrome) आनुवंशिक विकार (genetic dysfunction) है, जो शरीर में कॉपर (Copper) का बनना रोकता है. इससे ब्रेन (Mind) और तंत्रिका तंत्र यानी नर्वस सिस्टम (nervous system) के विकास में मुश्किल होती है. इस बीमारी के चलते बच्चे three साल भी नहीं जी पाते. एक लाख में एक बच्चे को ही यह सिंड्रोम होता है.

पिता के संघर्ष की कहानी
30 साल के शु वेई (Xu Wei) बताते हैं, ‘मेरे पास सोचने का वक्त नहीं है, कि इसे करना है या नहीं, मुझे तो यह करना ही था. बेटे को गोद में लिए वेई कहते हैं, ‘भले ही वह चल या बोल नहीं सकता, पर उसके पास एक आत्मा है और वह भावनाओं को महसूस करता है. डॉक्टरों द्वारा यह बताए जाने के बाद कि बीमारी लाइलाज है. आराम पहुंचाने के लिए कॉपर हिस्टिडाइन (copper histidine) दिया जाता है, पर लॉकडाउन के चलते चीन में यह मिल नहीं रहा. विदेश जाना संभव नहीं. तब उन्होंने खुद ही फार्मास्यूटिकल्स (prescribed drugs) पर रिसर्च करते हुए इसे घर पर ही बनाना शुरू कर दिया. वेई ने बताया कि दोस्त और परिजन इसके खिलाफ थे, उन्हें यह असंभव लगता था.

कैसे हुआ रिसर्च वर्क
मेनकेस (Menkes) पर ऑनलाइन दस्तावेज भी अंग्रेजी में थे, इन्हें समझने के लिए ट्रांसलेशन सॉफ्टवेयर की मदद ली. तब कॉपर हिस्टिडाइन (copper histidine) का पता चला. उपचार शुरू करने के दो हफ्ते बाद ब्लड टेस्ट के रिजल्ट सामान्य आए. हाओयांग (Haoyang) की मां से बेटे की यह स्थिति देखी नहीं जाती, इसलिए वे 5 साल की बेटी को लेकर अलग रहती हैं. हाईस्कूल तक पढ़े शु वेई (Xu Wei) बेटे की बीमारी से लड़ने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.

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ऑनलाइन कारोबारी शु वेई (Xu Wei) कहते हैं,‘मैं नहीं चाहता कि बेटा सिर्फ मौत का इंतजार करे, भले ही मैं फेल हो जाऊं, पर चाहता हूं कि उसे एक उम्मीद दे सकूं.’ पिता की इस जद्दोजहद को देखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की बायोटेक लैब वेक्टरबिल्डर (vectorbuilder) ने इस बीमारी पर रिसर्च शुरू की है. जीन थेरेपी (gene remedy) के ट्रायल कुछ माह में शुरू होंगे. पर हाओयांग को इसका फायदा मिलेगा, इसकी उम्मीद कम ही है.

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खरगोशों और खुद पर किया ट्रायल
शु वेई (Xu Wei)  के पिता जिआनहोंग (jianhong) बताते हैं, वेई का ये मिशन बहुत कठिन था. पर 6 हफ्ते तक उसने खुद को झोंककर दवाई बना ही ली. वेई ने पहले खरगोशों पर ट्रायल किया. इसके बाद खुद के शरीर में इंजेक्ट की. साइड इफेक्ट न दिखने पर बेटे पर इस्तेमाल शुरू किया. वेई के मुताबिक कमर्शियल वैल्यू नहीं होने से दवा कंपनियों को इसमें कम दिलचस्पी थी. पर मुझे तो दवा चाहिए ही थी, इसलिए घर पर ही बना दी.

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